Neetu Chaturvedi
Class 11 (Science)
सभ्य समाज
लोगों की सोच आखिर कहाँ जा रही है?
सही-गलत सोचने की क्षमता,
क्या कहीं ज़मीन पर दफ़न होती जा रही है?
या फिर, किसी सड़ी लकड़ी के समान,
उस पर दीमक लगती जा रही है?
परिवार की बहू को दुख देकर भी,
सोचा जाता है कि
अपनी खुद की बेटी हमेशा खुश रहे।
माता-पिता को वृद्धाश्रम भेजकर भी,
हर रोज भगवान की पूजा कर
सुख-शांति और धन की मनोकामना की जा रही है।
दूसरों को अपमानित करके भी,
लोग अपने सम्मानित जीवन की
उम्मीदें किए जा रहे हैं।
स्त्रियों को विधवा मरने
और पुरुषों को
पुनर्विवाह के लिए मनाया जाता है।
क्या इसी तरह समाज को
सभ्य बनाने की कोशिश की जा रही है?
या फिर, इस गलत सोच से
सिर्फ दमघोंटू वातावरण स्थापित हो रहा है?