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मेरे जीवनदाता

मैं पृथ्वी हूँ तो पूरे ब्रह्मांड हैं पापा,
मेरे दिल की हर एक धड़कन हैं पापा,
मेरी ज़िंदगी के हर एक पल हैं पापा,
मेरे जीवनदाता हैं पापा।
मैं मछली हूँ तो सागर हैं पापा,

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सभ्य समाज

लोगों की सोच आखिर कहाँ जा रही है?
सही-गलत सोचने की क्षमता,
क्या कहीं ज़मीन पर दफ़न होती जा रही है?
या फिर, किसी सड़ी लकड़ी के समान,
उस पर दीमक लगती जा रही है?

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Brotherhood

Friends like brothers, hearts that sync,
Stand together quicker than you think.
Laugh in chaos, rise when we drop —
No doubt about it — bhai-chara on top.
In every storm, we never stop.

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प्रकृति वसुंधरा है

हरी-भरी जिसे कहते हम प्रकृति
प्रकृति में विशाल समुद्र है समाया
जलीय जीवों ने जिसे घर है बनाया
झरने नित झर-झर बहते हैं
जीवन का सारा सार कहते हैं

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पुस्तकें

पुस्तकें मेरी जीवन हैं!!
पुस्तकें हमें ज्ञान देती हैं,
पुस्तकें हमें सोचना सिखाती हैं।
पुस्तकें हमें पर देती हैं,
पुस्तकें हमें राह दिखाती हैं।

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परीक्षाओं के प्रति बच्चों का डर

परीक्षा जिसका नाम सुनते ही
आधे विद्यार्थियों की शक्ल देखने लायक होती है।
परीक्षाओं से सभी अंदर तो
थोड़ा डरे हुए होते ही हैं।
इस बात पर नहीं कि

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बाकी है

बाकी है
गुज़र रही है उम्र
पर जीना अभी बाकी है
जिन हालातों ने
पटका है जमीन पर

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